भारत और यूरोपीय देशों के प्रवासन और गतिशीलता समझौते, असल में क्या देते हैं
जर्मन संघीय मंत्रिमंडल ने 16 अक्तूबर 2024 को भारत के लिए कुशल श्रमिक रणनीति अपनाई, जिसमें 30 उपाय हैं। समझौता वीज़ा नहीं देता, रास्ता राष्ट्रीय कानून से चलता है।
प्रवासन और गतिशीलता समझौता किसी को वीज़ा नहीं देता। वह दो सरकारों के बीच का ढांचा है जिसके भीतर वीज़ा, योग्यता की मान्यता और वापसी की प्रक्रियाएं तय होती हैं। जर्मन संघीय मंत्रिमंडल ने 16 अक्तूबर 2024 को भारत के लिए कुशल श्रमिक रणनीति अपनाई, जिसमें 30 ठोस उपाय दर्ज हैं। आवेदन फिर भी राष्ट्रीय कानून के तहत ही चलता है।
यह फर्क इसलिए मायने रखता है क्योंकि भारत में इन समझौतों की खबर अक्सर इस तरह पढ़ी जाती है जैसे कोई दरवाज़ा खुल गया हो। दरवाज़ा वही रहता है। जो बदलता है वह कतार की लंबाई, कागज़ों की मान्यता और दूतावास की क्षमता है।
जर्मनी वाला उदाहरण सबसे साफ़ है
जर्मनी की कुशल श्रमिक रणनीति जर्मन श्रम एवं सामाजिक मामलों के मंत्रालय और संघीय विदेश कार्यालय के नेतृत्व में तैयार हुई थी। इसमें जो उपाय गिनाए गए हैं वे प्रशासनिक हैं और इसीलिए उपयोगी हैं: प्रक्रियाओं में कागज़ी बोझ घटाना, भारतीय आवेदकों के लिए वीज़ा जारी करने का डिजिटलीकरण, भारत में जर्मन भाषा की पढ़ाई बढ़ाना, संघीय रोज़गार एजेंसी की ओर से नौकरी मेलों का आयोजन, और जर्मनी में पढ़ रहे भारतीय छात्रों के लिए सलाह सेवाएं। यह रणनीति उसी प्रवासन और गतिशीलता साझेदारी पर आगे बढ़ती है जिस पर भारत और जर्मनी ने 2022 में हस्ताक्षर किए थे।
पैमाना भी दर्ज है। जर्मन श्रम मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार फरवरी 2024 में 1,37,000 भारतीय जर्मनी में ऐसे रोज़गार में थे जिन पर सामाजिक बीमा अंशदान लागू होता है। अक्तूबर 2024 में दोनों सरकारों के परामर्श के दौरान जर्मन पक्ष ने कुशल भारतीयों के लिए वीज़ा की संख्या 20,000 से बढ़ाकर 90,000 प्रति वर्ष करने का इरादा बताया, जैसा उस समय की रिपोर्टिंग में दर्ज है। यह इरादा है, पात्रता नहीं।
समझौता क्या करता है और क्या नहीं
| समझौता जो करता है | समझौता जो नहीं करता |
|---|---|
| वीज़ा और मान्यता की प्रक्रियाओं पर दोनों सरकारों को एक मेज़ पर लाता है | किसी व्यक्ति को काम करने का अधिकार नहीं देता |
| डिजिटल वीज़ा और नियुक्तियों की क्षमता बढ़ाता है | परमिट की कानूनी शर्तें नहीं बदलता |
| योग्यता की मान्यता के लिए ढांचा बनाता है | डिग्री को अपने आप मान्य नहीं कर देता |
| भाषा और कौशल कार्यक्रमों को जोड़ता है | भाषा की शर्त नहीं हटाता |
| अनियमित प्रवास और वापसी पर सहयोग तय करता है | अवैध रोज़गार को वैध नहीं करता |
तालिका की तीसरी पंक्ति सबसे ज़्यादा गलत समझी जाती है। मान्यता का ढांचा बन जाने का मतलब यह नहीं कि आपकी डिग्री अपने आप मान ली जाएगी। मान्यता अब भी एक अलग फाइल है और उसका पहला कदम भारत में है, यानी दस्तावेज़ों का राज्य स्तर पर सत्यापन और फिर विदेश मंत्रालय का अपोस्टिल, जिसका शुल्क 50 रुपये प्रति दस्तावेज़ है और अधिकृत एजेंसी का शुल्क 84 रुपये प्रति दस्तावेज़। पूरी प्रक्रिया भारतीय दस्तावेज़ों के अपोस्टिल में दर्ज है।
जर्मनी अकेला नहीं है, पर हर समझौता एक जैसा नहीं
भारत के पास यूरोप में दूसरा और पुराना उपकरण भी है: सामाजिक सुरक्षा समझौते। विदेश मंत्रालय के सामाजिक सुरक्षा समझौतों के पृष्ठ पर 22 देश और क्षेत्र दर्ज हैं, जिनमें Belgium, France, Luxembourg, Netherlands, Hungary, Denmark, Czech Republic, Germany, Finland, Sweden और Austria शामिल हैं। ये समझौते प्रवासन के बारे में नहीं, पेंशन और अंशदान के बारे में हैं, और इसलिए इनका असर नौकरी मिलने के बाद शुरू होता है।
नतीजा यह है कि भारत और किसी यूरोपीय देश के बीच कोई समझौता होने की खबर पढ़ते समय पहला सवाल यही होना चाहिए कि वह किस चीज़ का समझौता है। गतिशीलता का समझौता प्रक्रिया की गति बदलता है। सामाजिक सुरक्षा का समझौता आपके पैसे का रास्ता बदलता है। दोनों में से कोई भी परमिट की शर्तें नहीं बदलता।
जर्मनी में परमिट की असली कड़ी जर्मनी की वर्क परमिट प्रक्रिया में दर्ज है, और उच्च योग्यता वाले पदों का अलग रास्ता EU Blue Card में। जिन नियोक्ताओं के लिए यह गलियारा काम का है, उनके लिए प्रक्रिया नियोक्ताओं के लिए पन्ने पर दर्ज है।
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भारत से यूरोप के राष्ट्रीय D वीज़ा का आवेदन VFS Global केंद्र पर जमा होता है, और जर्मन मिशन के अनुसार फाइल को दूतावास तक पहुंचने में 6 कार्य दिवस तक लगते हैं।
भारत और यूरोप के सामाजिक सुरक्षा समझौते और आपकी पेंशन
विदेश मंत्रालय के सामाजिक सुरक्षा समझौतों के पृष्ठ पर 22 देश और क्षेत्र दर्ज हैं। EPFO का Certificate of Coverage केवल भेजे गए कर्मचारी के काम आता है।