भारत और यूरोप के सामाजिक सुरक्षा समझौते और आपकी पेंशन
विदेश मंत्रालय के सामाजिक सुरक्षा समझौतों के पृष्ठ पर 22 देश और क्षेत्र दर्ज हैं। EPFO का Certificate of Coverage केवल भेजे गए कर्मचारी के काम आता है।
यूरोप में काम करने वाले भारतीय कर्मचारी के वेतन से जो सामाजिक सुरक्षा कटती है, वह पैसा खोया नहीं जाता, बशर्ते दोनों देशों के बीच समझौता हो। विदेश मंत्रालय के सामाजिक सुरक्षा समझौतों के पृष्ठ पर 22 देश और क्षेत्र दर्ज हैं। यूरोप में इनमें Belgium, France, Luxembourg, Netherlands, Hungary, Denmark, Czech Republic, Germany, Finland, Sweden और Austria शामिल हैं।
यह विषय सूखा लगता है और इसी वजह से इसे नौकरी लेते समय कोई नहीं पढ़ता। पर यही वह जगह है जहां पंद्रह साल का काम या तो एक पेंशन बनता है या एक रसीद।
समझौता तीन काम करता है
पहला, दोहरी कटौती रोकना। अगर भारतीय नियोक्ता किसी कर्मचारी को यूरोप भेजता है और उसका वेतन भारत में ही चलता रहता है, तो कर्मचारी भविष्य निधि संगठन (EPFO) से Certificate of Coverage लेकर गंतव्य देश की सामाजिक सुरक्षा से छूट ली जा सकती है। यह केवल भेजे गए, यानी detached कर्मचारी पर लागू होता है।
दूसरा, अवधियों को जोड़ना। अधिकांश यूरोपीय पेंशन प्रणालियां एक न्यूनतम अंशदान अवधि मांगती हैं। समझौता होने पर भारत में की गई सेवा की अवधि उस गिनती में जोड़ी जा सकती है, जिससे वह पेंशन बनती है जो अकेले यूरोप की सेवा से नहीं बनती।
तीसरा, पेंशन का निर्यात। समझौते के तहत अर्जित लाभ भारत लौट आने के बाद भी लिया जा सकता है, इसलिए वापसी का फैसला पेंशन को खत्म नहीं करता।
| स्थिति | कौन अंशदान लेता है | समझौते से क्या मिलता है |
|---|---|---|
| भारतीय नियोक्ता ने यूरोप भेजा, वेतन भारत में | भारत, EPFO के Certificate of Coverage के साथ | गंतव्य देश की सामाजिक सुरक्षा से छूट |
| यूरोपीय नियोक्ता ने सीधे नियुक्त किया | गंतव्य देश की प्रणाली | अवधियों का जोड़ और पेंशन का निर्यात |
| समझौते के बिना वाला देश | गंतव्य देश की प्रणाली | कोई जोड़ नहीं, वापसी पर दावा कठिन |
ध्यान दीजिए कि दूसरी पंक्ति ही अधिकांश भारतीय कर्मचारियों की स्थिति है। जो व्यक्ति Croatia की किसी कंपनी में सीधे नियुक्त हुआ है, वह Croatian प्रणाली में अंशदान देगा, और Certificate of Coverage उसके किसी काम का नहीं है। उसके लिए समझौते का मूल्य बाद में दिखता है, जब अवधियों को जोड़ने या पेंशन को भारत मंगाने की बात आती है।
भारत की तरफ का कवच अलग है
भारत की तरफ एक दूसरा उपकरण है जिसे लोग इसी विषय में गिन लेते हैं, जबकि वह अलग है। प्रवासी भारतीय बीमा योजना 10 लाख रुपये का बीमा कवर देती है और विदेश मंत्रालय की सलाह के अनुसार इसका प्रीमियम दो साल के लिए 275 रुपये और तीन साल के लिए 375 रुपये है। यह बीमा है, पेंशन नहीं, और यह मुख्य रूप से ECR श्रेणी के उत्प्रवास से जुड़ा है, जहां पंजीकृत भर्ती एजेंट को यह कवर खरीदना होता है। यूरोप की नौकरी पर यह अपने आप लागू नहीं होता।
पैमाने के लिए एक आंकड़ा। जर्मन श्रम मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार फरवरी 2024 में 1,37,000 भारतीय जर्मनी में ऐसे रोज़गार में थे जिन पर सामाजिक बीमा अंशदान लागू होता है। यानी हर महीने इन लोगों के वेतन से जो कटता है, उसका हिसाब किसी न किसी दिन देना होगा।
वह चूक जो पंद्रह साल बाद दिखती है
व्यावहारिक विफलता कागज़ों की होती है, कानून की नहीं। कर्मचारी चार साल Netherlands में, फिर तीन साल Czechia में और फिर छह साल Germany में काम करता है, और हर बार नई सामाजिक सुरक्षा संख्या मिलती है। भारत लौटने पर दावा करते समय तीनों देशों के रिकॉर्ड चाहिए, और तीनों पुराने नियोक्ताओं के पते बदल चुके हैं। समझौता अब भी मौजूद है, पर सबूत नहीं है।
इसका उपाय सस्ता और उबाऊ है। हर देश की सामाजिक सुरक्षा संख्या, हर साल का वार्षिक विवरण और नौकरी छोड़ते समय का प्रमाणपत्र संभालकर रखें। दावे के समय जिन भारतीय दस्तावेज़ों की ज़रूरत पड़ेगी उन पर विदेश मंत्रालय का अपोस्टिल चाहिए होगा, जिसका शुल्क 50 रुपये प्रति दस्तावेज़ है और अधिकृत एजेंसी का 84 रुपये प्रति दस्तावेज़।
गतिशीलता के समझौते और सामाजिक सुरक्षा के समझौते अलग चीज़ें हैं, और उनका फर्क प्रवासन और गतिशीलता समझौतों में समझाया गया है। जर्मनी में निवास परमिट की प्रक्रिया जर्मनी के निवास परमिट के चरण में दर्ज है, और आने के बाद का पूरा प्रबंध स्थानांतरण की कड़ी में। नियोक्ता की तरफ यह हिस्सा नियोक्ताओं के लिए पन्ने पर दर्ज है।
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